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💐** योग पर विशेष ध्येय विषय **💐
*💐- महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन और योग के विषय को व्यापकता के साथ प्रतिपादित किया है। योग दर्शन
का इससे श्रेष्ठ स्थापन अन्यत्र सुदुर्लभ है।अतः सामान्य व्यक्ति को योग के विषय से कैसे लाभान्वित किया जाए साथ ही उनके अन्दर योग के प्रति कैसे आकर्षण हो यह अनिवार्य उपकारी विषय है।
*💐- पातंजल योगसूत्र में चार पाद हैं जिन्हें अध्याय के स्थान पर पाद कहा गया है।ये हैं -- १ - समाधिपाद २ -
साधनपाद ३- विभूतिपाद और ४- कैवल्यपाद।
समाधिपाद में ५१ सूत्र हैं। साधन पाद में ५५ सूत्र हैं।
विभूतिपाद में ५५ सूत्र हैं तथा कैवल्यपाद में ३४ सूत्र हैं।
कुल १९५ सूत्र पातंजल योगसूत्र में कहे गए हैं। इन्हें याद कर इनके शब्दों का सामान्य अर्थ जानकर व्यक्ति दर्शन विभाग में प्रोफेसर हो सकता है।यदि कोई इनके ऊपर लिखित भाष्योंको भी पढ़ लेतो वह योगका महाविद्वान हो सकता है पर सामान्य जनता तक योगको ले जाने के लिए योग का दर्शन और स्पर्शन होना चाहिए तथा जन मन को उससे जोड़ने का प्रयत्न होना चाहिए।
*💐-- महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा- "" योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। "" समस्त योग का निचोड़ और महाज्ञान है यह सूत्र।जिसने इस सूत्रको समझ लिया, हृदयंगम कर लिया उसने योग को समझ लिया,जी लिया।
इस सूत्र का अधिकार चारों पाद में बना हुआ है।इसका सीधा सादा अर्थ है--चित्तवृत्ति का निरोध योग है। मन से श्रेष्ठ बुद्धि, बुद्धि से श्रेष्ठ चित्त होता है।उस चित्त की वृत्ति को सम्पूर्णतः शांत कर देना योग है।इस विषय पर योग शास्त्र में विशाल लेखन हुआ है।यदि इस विषय को छोड़ कर केवल आसन या अन्य योग अंग पर विमर्शकिया जाये या उनको अपनाया जाये तो व्यक्ति योग भ्रष्ट होता है।
*💐-महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंग बतलायें हैं। ये हैं-यम,नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा ,ध्यान , समाधि।इन आठ अंगों में से किसी एकके न रहने पर योग रूपी पुरुष विकलांग होता है।अतः इन आठ अंगोंकी चर्चा के बिना योग का विषय विफल होता है।
अनेक लोग यम नियम को योग का अंग नहीं मानते।वे सीधे आसन से योग का आरम्भ करते हैं।वैसी स्थिति में योग के षड् अंग होते हैं।यदि यम नियम को योग का अनिवार्य अंग नहीं माना जायेगा तब चित्त का निरोध नहीं होगा।ऐसे में आसन,प्राणायाम से होते हुए ध्यान तक पहुंचा जा सकता है पर समाधि प्राप्ति असम्भव है।कठोर आसन,प्राणायाम के द्वारा चित को बश में किया जाए इससे अच्छा और सरल है कि यम नियम द्वारा चित्त को
निरोधित किया जाए।महर्षि पतंजलि के इस सूत्र में बहुत रहस्य भरा पड़ा है। लगभग चालीस स्मृतियों (धर्मशास्त्रों)
में यम नियम को प्रत्यक्ष धर्म कहा गया है।इन दोनों के बिना व्यक्ति धार्मिक नहीं कहला सकता।तो क्या योग जानने के लिए धार्मिक होना आवश्यक है? हाँ है।सनातन यम नियम को धर्म मानता है और योग को मोक्ष प्राप्ति का कारक शास्त्र मानता है।कैवल्य का अर्थ ही है मोक्ष।
यदि यम नियम के बिना योग नहीं सम्भव तो फिर दूसरे मजहब के लोग इसे किस आधार पर स्वीकार करें।यहाँ स्पष्ट है कि यम -- अहिंसा,सत्य ,अस्तेय ( अचौर्य ), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( संग्रहत्याग) है। इसमें जिन लोगों को ये पांचतत्त्व स्वीकार्य नहीं हैंतो वे आसनिक हो सकते हैं योगी(यमी) नहीं। नियम में शौच(पवित्रता),संतोष,तप, वेद पाठ और ईश्वर भक्ति पांच तत्त्व समाहित हैं।
*💐---अतःभारतवर्ष की ओर से जिस योग को आगे बढाया जा रहा है वह यम, नियम रहित षडंग योग है।यदि आज विश्व मनुष्य का कल्याण षडंग योग से हो सकता है तो भी मानवता का बहुत बड़ा उपकार होगा।यदि लोग अपने अपने विश्वास के अनुसार भी यम नियम को मानें तो भी उस लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं पर यम नियम किसी को योगी तभी बना सकते हैं जब वह अहिंसक और संतोषी हो।इन दोनों का त्याग कर किया हुआ योग सर्व भक्षी और असुर बना सकता है जो दूसरे को लूट कर धनी बनना चाहते हैं। योग की विशेषता है पहले वह सब कुछ ले लेता है, चित्त से आकांक्षा को हर लेता है बाद में अष्ट सिद्धि और नौ निधि को भी दे डालता है।
यम और नियम पर योग शास्त्र से चर्चा धर्मशास्त्र में है।महर्षि अत्रि दश यम दश नियम मानते हैं।अतः मात्र यम नियम से प्राप्त होने वाली उपलब्धियाँ योग तुल्य उपलब्धियों से कम नहीं होतीं।अतः योग की चर्चा में इस विषयों का कतिपय लोगों को भड़का सकता है पर समाधिसे तक करने वाला कोई भी मनुष्य अपने दिग,देश,काल और समाज का श्रेष्ठतम व्यक्तित्व होता है।आगे हम योगके षडङ्ग विषयों पर विमर्श करेंगे जिनका
स्रोत योग ग्रन्थ न होकर अन्यत्र से। प्राप्त विषय भी होगा






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