प्रेम और विरह की परिभाषा

 विरह — प्रेम का सबसे ऊँचा स्वरूप

मनुष्य प्रेम में मिलने को लक्ष्य समझता है।

उसके लिए मिलन ही पूर्णता है,

और जुदाई — असफलता।


पर अस्तित्व की भाषा में इसका अर्थ बिल्कुल उल्टा है।

मिलन प्रेम की शुरुआत है,

विरह प्रेम की परिपक्वता।


जब तुम किसी के साथ होते हो,

तो प्रेम का सहारा उस व्यक्ति की उपस्थिति होती है।

तुम्हारा हृदय धड़कता है —

पर तुम आश्वस्त भी रहते हो,

क्योंकि प्रिय तुम्हारे पास है।


पर विरह…

विरह वह अग्नि है जिसमें प्रेम परीक्षा नहीं देता —

स्वयं को सिद्ध करता है।


किसी के पास रहकर प्रेम करना सहज है।

दूरी में प्रेम बनाए रखना — कठिन।

और फिर भी जो प्रेम दूरी में नहीं टूटता,

जो अनुपस्थिति में और गहरा हो जाता है,

जो मौन में और मुखर हो जाता है,

जो दुःख में भी सुंदर बना रहता है —

वही प्रेम अपनी चरम ऊँचाई पर पहुँच चुका होता है।


विरह तुम्हें सिखाता है कि

प्रेम व्यक्ति पर आधारित नहीं,

प्रेम अनुभूति पर आधारित है।


यदि किसी के जाने से प्रेम मर जाए —

तो वह प्रेम नहीं, निर्भरता थी।

यदि किसी के दूर हो जाने से प्रेम और बढ़ जाए —

तो वही प्रेम है।


इसलिए विरह प्रेम का अंत नहीं है।

विरह प्रेम का पवित्रीकरण है।


विरह में दो शरीरों का मिलन नहीं होता,

विरह में दो आत्माएँ मिलती हैं।

बिना स्पर्श, बिना शब्द, बिना उपस्थिति —

फिर भी एक अदृश्य पुल बना रहता है

जो टूटता नहीं,

चाहे संसार जितना भी समझा दे कि नाता समाप्त हो चुका है।


विरह में दर्द है —

पर यह वही दर्द है

जो अंधकार में पड़े बीज को अंकुर बनने के लिए सहना पड़ता है।

मिलन तुम्हें खुश करता है —

पर विरह तुम्हें जागृत करता है।


जो प्रेम विरह से गुजर चुका हो

वह तुच्छ नहीं रह जाता —

वह पूजा बन जाता है।

उसमें माँग नहीं,

आशीर्वाद होता है।

उसमें अधिकार नहीं,

स्वतंत्रता होती है।

उसमें चिपकाव नहीं,

समर्पण होता है।


मिलन में तुम कह सकते हो,

“तुम मेरे हो।”

पर विरह में एक नई भाषा जन्म लेती है —

“तुम जहाँ भी हो… मेरे ही हो।”


और एक दिन,

जुदाई की रातें अपने चरम पर पहुँचकर

एक शांत सुबह में बदल जाती हैं।

उस सुबह प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है।

प्रेम बस प्रेम बन जाता है —

बिना किसी पते के, बिना किसी नाम के,

पर पहले से कहीं अधिक जीवित।


वही क्षण है

जब तुम्हें समझ आता है —


विरह प्रेम की मृत्यु नहीं,

प्रेम का पुनर्जन्म है।

कॉपी पेस्ट,, विनोद 

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